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Home सियासत बिहार जीत के मायने, दिल्ली से वरिष्ठ पत्रकार राज पाठक की कलम से....

बिहार जीत के मायने, दिल्ली से वरिष्ठ पत्रकार राज पाठक की कलम से....

✍️आखिरकार बिहार में नीतीश कुमार की अगुवाई में एनडीए ने सरकार बना ली एनडीए ने चुनावों में 125 सीटें लेकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया हालांकि एनडीए के घटक दलों में बीजेपी की सबसे ज्यादा 74 सीटें लेकर मजबूत स्थिति में नितीश बाबू को बिहार की कमान देना बीजेपी की रणनीति का हिस्सा है| यहां बीजेपी ने एक तीर से कई निशाने लगाए हैं जिसके लिए बीजेपी के रणनीतिकार जाने जाते हैं| बीजेपी साफ-सुथरी छवि बनाना चाहती है और यह बताना चाहती है कि वह गठबंधन के साथियों के साथ वादा खिलाफी नहीं करती भले ही वह चुनाव के बाद मजबूत स्थिति में आ जाए।

दूसरा बीजेपी की नजर अगले साल होने वाले पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव पर है बंगाल में देश के दूसरे प्रदेशों से आए प्रवासियों की आबादी का 50% बिहार के प्रवासियों की संख्या है जो ज्यादातर मजदूर लोग व मिडिल क्लास के हैं और वह वहां वोट बैंक भी है बीजेपी बिहार के जीडी जेडीयू और अन्य घटक दलों के नेताओं का इस्तेमाल बंगाल चुनाव में करेगी जो बंगाल के कुछ इलाकों में अपना प्रभाव रखते हैं बीजेपी ने बंगाल में जमीनी तैयारियां शुरू कर दी है तोड़ो और राज करो की रणनीति पर बंगाल में बीजेपी ने शुरुआती कदम रख रखे थे अब ध्रुवीकरण के सहारे नैया पार करना चाहेगी।


बीजेपी ने अपने पैटर्न पर दो उपमुख्यमंत्री तार किशोर प्रसाद और रेणु देवी को बनाया है। सुशील मोदी को हराकर तार किशोर और रेणु देवी को लाकर बीजेपी ने संदेश दिया है कि वह व्यक्ति के बदले कार्यकर्ताओं को महत्व देती है| बिहार के उप मुख्यमंत्री के रूप में लंबे समय तक काम करने वाले सुशील कुमार मोदी मूलतः राजस्थान के वैश्य समुदाय से हैं जबकि तार किशोर मुलत: बिहारी हैं वैश्य समुदाय से है बीजेपी ने अपने वोटर को निश्चित किया है| तार किशोर बीजेपी के कर्मठ कार्यकर्ता और संगठनकर्ता है वह दल की नीतियों को अधिक प्राथमिकता देंगे जिसके कारण नीतीश कुमार पर कसावट बनी रहे। दूसरी ओर रेणु देवी अति पिछड़ा वर्ग से आती हैं जो जेडीयू का वोटर है इस बहाने बीजेपी जेडीयू के वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश में है।

चुनावों में कुल मिलाकर बीजेपी ने सधी हुई रणनीति अपनाकर विरोधियों को मात दी पहले नीतीश को भुनाने की कोशिश की लेकिन दूसरे चरण के मतदान आते आते बीजेपी ने समझ लिया कि नीतीश को आगे करने में नुकसान है, तो प्रधानमंत्री मोदी को आगे किया और बीजेपी प्रचार में नीतीश कुमार के फोटो मोदी के साथ नहीं मिले, दूसरी ओर चिराग पासवान को एनडीए से अलग चुनाव मैदान में उतरवाकर वोट काटवा बना दिया जिसका नुकसान जेडीयू और आरजेडी को हुआ।

नीतीश कुमार के शासन से बिहार की जनता उकता चुकी थी परेशान थी बुनियादी सुविधाओं की स्थिति संतोषप्रद नहीं कही जा सकती ऐसे में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के खिलाफ जबरदस्त anti-incumbency थी गुस्सा था| नीतीश कुमार ने चुनाव प्रचार के दौरान जनता के गुस्से को भाप लिया था इसलिए एनडीए के बहुमत के बाद भी वह आश्वस्त नहीं थे कि वह मुख्यमंत्री बनेंगे उनके चेहरे पर आत्मविश्वास नहीं था बहरहाल भले ही नितीश अपनी चौथी पारी खेलने के लिए चल पड़े हो पर लगता है कि जेडीयू ने चुनाव में साख खोई है । अंदाजा तो यह भी लगाया जा रहा है कि बंगाल चुनावों के बाद या कुछ और आगे नीतीश पर दबाव बढ़ा दिया जाए जिससे वह खुद मुख्यमंत्री पद की कुर्सी छोड़ने की पेशकश कर दें या बीजेपी नए फार्मूले के तहत बीजेपी नेता को मुख्यमंत्री बनाने के लिए नीतीश को राजी कर ले, यह तो मानना पड़ेगा की कमजोर स्थिति होने पर भी नीतीश मुख्यमंत्री हैं भले ही दबाव में रहे या बीजेपी उनके कंधे का इस्तेमाल करें दूसरा बीजेपी की रणनीति को भी मानना पड़ेगा कि पिछले कार्यकाल में सत्ता में रहते हुए सरकार की anti-incumbency को अपने पक्ष में भुनाया।

बात आरजेडी की या तेजस्वी यादव की करें तो इस चुनाव में तेजस्वी यादव मजबूत परिपक्व अगली पीढ़ी के नेता के रूप में उभरे हैं उन्होंने अपने पिता लालू यादव के जेल जाने के बाद पार्टी को संभाला ही नहीं बल्कि पिता लालू की छवि से बाहर भी निकले हैं| बीजेपी ने जब लालू यादव के भ्रष्टाचार का मुद्दा चुनाव प्रचार में उठाया तो तेजस्वी ने पोस्टर से पिता की तस्वीर हटा दी और मजे हुए नेता की तरह जनता में संदेश दिया कि वह जमाना गया अब नया जमाना है और उसके लिए माफी भी मांग ली तेजस्वी ने चुनाव प्रचार में नए मुद्दे बेरोजगारी पलायन जैसे मुद्दे उठाए नई पिच सेट की और उसी पिच पर बीजेपी समेत अन्य पार्टियों ने खेला भी लेकिन तेजस्वी इसे वोटों के रूप में तब्दील नहीं कर सके...? शायद महागठबंधन की मजबूरियां उस पर पकड़ और प्रबंधन ढीला रहा है फिर भी आरजेडी चुनावो में सबसे मजबूत पार्टी के रूप में उभरी है सबसे ज्यादा 75 सीटें हासिल की है एक मजबूत विपक्ष के रूप में सरकार के समक्ष है।

महागठबंधन में कांग्रेस की भूमिका महागठबंधन की लुटिया डुबोने की रही है कांग्रेस ने अपना जनाधार खो दिया है और ज्यादा सीटें लेकर आरजेडी का नुकसान ही किया है कांग्रेश ने 70 विधानसभा सीटों पर प्रत्याशी उतारे जिसमें से 19 सीटों पर ही कांग्रेस जीत दर्ज कर सकी।

वही वामपार्टियों ने 29 सीटों पर चुनाव लड़ा और 16 सीटों पर जीत हासिल की वाम का स्ट्राइक रेट 80% रहा मतलब जनता में अपने मुद्दों को लेकर छटपटाहट बाकी है और अपनी समस्याओं से उक्त आ रहे हैं।

चुनावों में सबसे ज्यादा चिराग पासवान ने खोया है नीतीश को खत्म करने के चक्कर में युवा नेता चिराग पासवान कहीं के नहीं रहे राजनीति के मौसम वैज्ञानिक कहे जाने वाले रामविलास पासवान की विरासत को संभालने के लिए चिराग को बहुत कुछ सीखने की जरूरत है बिहार में एआईएमआईएम ने बेहतरीन प्रदर्शन किया ओवैसी को 5 सीटें मिली ओवैसी ने बिहार की राजनीति में अपने पैर जमाए हैं उनकी मौजूदगी में अल्पसंख्यक संतुष्ट वही विकासशील इंसान पार्टी और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा ने चार चार सीटें जीतकर सरकार में शामिल है छोटी क्षेत्रीय पार्टियां सत्ता सुख भोगेगी।

कुल मिलाकर बिहार विधानसभा चुनाव बड़ा दिलचस्प रहा नीतीश मुख्यमंत्री तो बन गए पर मजबूत बीजेपी के दबाव में काम करने को मजबूर होना पड़ सकता है मजबूत विपक्ष भी नीतीश के सामने परेशानी पैदा करता रहेगा दो ही मजबूत होकर उभरे एक बीजेपी और दूसरा तेजस्वी यादव लेकिन बीजेपी और तेजस्वी यादव में एक अंतर समझ आया कि बीजेपी ने महागठबंधन से फायदा उठाया बल्कि महागठबंधन की पार्टियों को अपने हित में इस्तेमाल किया जबकि तेजस्वी नहीं कर पाए उनके पास उतना अनुभव नहीं था और तेजस्वी के पास रणनीतिकारों की टीम का अभाव था दूसरा चेहरा भी नहीं था।

बाहर हाल भारतीय राजनीति ध्रुवीकरण इस कदर हावी हो गया है कि आधारभूत मुद्दे गौण होते रहे हैं देश में राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं ने समाज को दो तरह से बांट दिया है-पहले जातिगत वोट बैंक के आधार पर दूसरा धार्मिक ध्रुवीकरण पर आधारित चुनावी राजनीति, जो सामाज और राष्ट्र के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक है यहां आकर असली मुद्दे खत्म होते चले गए राजनीतिज्ञों में तत्कालीन मुद्दे और स्वार्थ पूर्ण ही सर्वोपरि हो गया और राजनीति चेतना सामाजिक चेतना कुंद होती चली गई जिसका खामियाजा देश को भुगतना पड़ेगा।


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