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मवेशियों के तर्ज पर आदिवासियों के लिये रोड में गड्ड लगे थे पूड़ी के पैकेट , बलि लेने का कार्यक्रम बंद करो - बंद करो ...?

*राजा कालस्य कारणम्*

कालौ वा कारणं राज्ञो राजा वा कालकारणम्।
इति ते संशयो मा भूद् राजा कालस्य कारणम्।।

महाभारत के शांति पर्व में भीष्म युद्धिस्थर से कहते हैं, जैसा राजा होगा वैसा ही समय होगा, अर्थात शासक ही काल यानी परिस्थितियों का निर्माण करता है, जब अच्छी परिस्थियों की जिम्मेदारी शासक की होती है तो बुरी स्थितियों का उत्तरदायित्व भी निर्धारित किया जाना चाहिए ।

कुछ दिन पूर्व ऐसे ही विकास यात्रा में हो रहे अपसगुन को लेकर एक लेख लिखा था, अभी लहिया की घटना को बीते बहुत अधिक दिन नही हुए थे, शुक्रवार को एक ह्रदय विदारक घटना फिर से घटित हो गई, और कल विकास यात्रा का समापन भी हो गया इन 20 दिनो में विकास लड़खड़ाते लड़खड़ाते हाफने तो लग ही गया था, शुक्रवार की रात विकास विनाश में बदल गया, और हमारे सीधी के कइयों मासूम काल के गाल में समा गए ...

आज के डिजिटल युग में अपनी बात कहने के लिए मंच की आवश्यकता नहीं रह गई है, सुदूर देश में बैठा व्यक्ति इंटरनेट के थोड़े से डाटा की मदद से अपनी बात और संदेश लाखो किलोमीटर दूर किसी भी व्यक्ति को सेकंड में भेज सकता है, फिर राजनीतिक संदेश पहुंचाने के लिए ऐसी रैलियों की आवश्यकता महज एक शक्ति प्रदर्शन का प्रतीक मात्र है, जिसमे दिल्ली से आए आका को ये दिखाया जा सके की देखो हम बीस साल के बाद भी कितने लोकप्रिय हैं, ये जो छुटपुट विरोध की खबरें छपती हैं ये महज थोथी मीडियाबाजी के अतिरिक्त और कुछ नही ।

राशन पर्ची से नाम काट देने का भय, आवास की सूची में नाम जोड़ देने का प्रलोभन, दारू और मनरेगा की मजदूरी की सहायता से, बसों में जबरन भरी जाने वाली भीड़ को सरकारी कार्यक्रमों में परोस कर शक्ति प्रदर्शन करने का ट्रेंड कब से शुरू हुआ ये सही से याद नहीं है, लेकिन पिछले कुछ सालों में इसकी आवृति बहुत अधिक बढ़ चुकी है, पहले महीनो में ये इवेंट होते थे, आज रोज ही हो रहे हैं ।
जिले के मुखिया पार्टी अध्यक्ष की भांति आदेश देते हैं, एसडीएम, सीईओ मंडल और ब्लॉक अध्यक्षों की तरह हिकमत अमली में जुट जाते हैं, कैसे हमारी कुर्सी सुरक्षित रही आए, हर कोई जानता है ये प्रताड़ना है, लेकिन कुर्सी का मोह सच बोले नही बुलाता ।

लगभग हर सभा में आती जाती बसों में दुर्घटना होती है, और किसी न किसी शहर से खबर आती ही है की मुख्यमंत्री की रैली में जा रहे या मुख्यमंत्री की रैली से आ रहे वाहन दुर्घटना ग्रस्त हुए और कुछ लोगो की मृत्यु हो गई ,जब राज्य में हो रहे विकास की जिम्मेदारी लेने के लिए विकास यात्राएं निकाल कर उनका श्रेय लिया जा रहा है, तो इस तरीके की घटनाओं की जिम्मेदारी भी राजा की होती है ।

प्रशासनिक स्तर पर जिम्मेदारियों के लिए भी बातें हो रही हैं, पूड़ी सब्जी के लालच में रूट क्यों डायवर्ट किया गया, शायद वरिष्ठ अधिकारियों को ये दिखाने की कोशिश नोडल एजेंसी नही करते की हमने हास्टलों से गर्म गर्म पूड़ी सब्जी भी बटवाई है, तो ये हादसा नही होता , बांटना ही था तो जाते वक्त या फिर मोहनिया टनल के बजाय छुहिया घाटी के नीचे पैकेट का वितरण किया जाना क्या न्याय संगत नही था ..? और तो और नोडल एजेंसी द्वारा टनल के पास सड़कों में जिस तरह भोजन पानी के पैकेट रोड में गड्ड लगाये थे तस्वीरों से एहसास होता है कि आदिवासियों के लिये नही ...यह मवेशियों के लिये गड्ड लगा है ... ? यह तमाम तथ्य क्या आला राजा को नही दिखे ... कारण जो भी रहे हो, लेकिन वरिष्ठ अधिकारियों को इस घटना से सीखना पड़ेगा । और अंत में बस इतना की यदि जनता अपने नेता को सुनना चाहेगी तो एक आवाज दीजिए भागे भागे चली आएगी, ये जबरन की भीड़ जोड़कर लोगो की बलि लेने का कार्यक्रम बंद होना चाहिए, बंद होना चाहिए ... विंध्य में डोरा डालना बंद करो .. बंद करो ।

सचीन्द्र मिश्र

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